
महात्मा गांधी एक प्रासंगिक विचारधारा
महात्मा गांधी का बलिदान दिवस 30 जनवरी 1948 एक नपुंसक नाथूराम गोडसे ने भारत को अंग्रेजों से आजादी दिलाने वाले अशक्त आदमी को गोली मारी, स्वतंत्र भारत का पहला आतंकवादी नाथूराम गोडसे जो गांधी जी के विचारों से इतना परेशान हो गया था कि उन्हें मारने के अलावा उसे कोई रास्ता नहीं सुझा, नाथूराम गोडसे में इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह एक अंग्रेज को गोली मार सके इसलिए अपने साथियों के साथ मिलकर उसने हमारे राष्ट्रपिता को गोली मारी, आपको बता दे कि पूरे विश्व में सबसे अधिक प्रतिमा जिसकी है वह महात्मा गांधी,आंदोलन की शुरुआत करने वाले गांधी के हजारों भक्त इस दुनिया में मौजूद है चाहे वह अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा हो, नेल्सन मंडेला हो,प्रधानमंत्री मोदी हो या कोई अन्य,सारे महात्मा गांधी के आदर्शों का पालन करते हैं
बापू की स्मृति हमारे हृदय पर अंकित है:
आपको बता दे कि बापू की पावन स्तुति हमारे हृदय पर सदा अंकित रहेगी,भले ही बापू हम इस दुनिया में नहीं है लेकिन उनके विचार हमेशा के लिए प्रासंगिक रहेंगे,आज जो हम आंदोलन करते हैं यह गांधी की ही देन है,सत्य अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी के विचारों से अंग्रेज भी प्रभावित थे,बापू ने हमेशा गीता का पाठ पढ़ा,शिक्षा पर जोर दिया और सत्य अहिंसा का बीज भारत में रोपा,यह देश है जहां बापू ने अपनी क्रांति की चिंगारी दिखाई थी जो आज पूरे विश्व में आग की तरह फैल रहा है और वह क्रांति है सत्य और अहिंसा की,जब देश अंग्रेजों से जंग लड़ रहा था उस समय राष्ट्र चेतनाशून्य था,विदेशी सत्ता ने देश की आत्मा पर प्रहार किया था लेकिन कुछ ऐसे विरले ही थे जिन्होंने अंग्रेजों से लोहा लिया,तमाम सारे क्रांतिकारी भगत सिंह,सुखदेव,राजगुरु,अशफ़ाकउल् ला खान,चंद्रशेखर आजाद,महात्मा गांधी,सुभाष चंद्र बोस ऐसी बहुत सारे अनगिनत क्रांतिकारी हैं जिन्होंने अंग्रेजों से आजादी के लिए अपनी जान लगा दी,बापू ने भारतीयों के शरीर में नई ऊर्जा फूकी थी,देश की आत्मा बापू के साथ खड़ी थी इसीलिए अंग्रेज बापू को गोली भी नहीं मार पाए लेकिन एक नपुंसक इंसान ने बापू को गोली मार दी यह कहते हुए की बापू एक विशेष वर्ग का ज्यादा ध्यान रखते है,जिस इंसान ने सोये हुए इंसान को जगाया जिससे कि बूढ़े,नौजवान,बच्चे,औरतें सभी निर्भय होकर अंग्रेजों के खिलाफ स्वतंत्रता के संग्राम में कूद पड़े
बापू की देन है आंदोलन:
देश को आज जो राजनीतिक स्वतंत्रता का वरदान मिला है वोे बापू की ही देन है जिसके लिए भारत देश के लोग बापू के प्रति कृतज्ञ रहेंगे,आपको बता दे की बापू ने अपना जीवन हिंदू मुस्लिम एकता को ही समर्पित कर दिया था,बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि जिस दिन हमें आजादी मिली थी यानी की 15 अगस्त 1947 उस दिन जवाहरलाल नेहरू से लेकर बड़े-बड़े क्रांतिकारी नेता गढ़ आजादी के जश्न में डूबे हुए थे लेकिन बापू इस जश्न में शामिल नहीं थे,उस दिन भी बापू हिंदू मुसलमान में हो रहे झगड़े के खिलाफ बंगाल में अनशन पर बैठे थे, 1948 में शांति बहाली के लिए बापू ने अनिश्चितकालीन उपवास रखा था,इस उपवास में धार्मिक गुरुओं,नेताओं ने मिलकर बापू के साथ शांति की प्रतिज्ञा ली,उपवास के कारण बापू का शरीर बहुत कमजोर पड़ गया था फिर भी वह सक्रिय थे,बापू बिरला हाउस के महरौली पहुंचे थे उपवास के पश्चात और वहां दरगाह पहुंचकर सबसे पहले उन्होंने छतिग्रस्त हिस्सों का निरीक्षण भी किया था,उन्होंने एक प्रार्थना सभा वहां पर आयोजित की जिसमें हिंदू,मुस्लिम,सिख,इसाई सभी समुदायों के लोग उपस्थित थे और उस सभा में बापू ने कहा था कि मैं यहां तीर्थ यात्रा पर आया हूं मैं मुसलमान,हिंदुओं,सिखों, ईसाईयों से अनुरोध करता हूं कि वे प्रतिज्ञा ले की दिल्ली और पूरे भारत में शांति रहेगी कोई भी अराजकता नहीं होगी,बापू का यह कहना था कि किसी भी मसले को शांति से सुलझाना चाहिए क्योंकि हिंसा से कुछ नहीं मिलता प्रेम और समझ से ही कोई समाज मजबूत होता है
