न्यायपालिका बनाम कार्यपालिका,जंग जारी
कार्यपालिका में बैठे लोग अब न्यायपालिका पर उंगली उठा रहे है,बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे जो जिन्होंने MBA की पढ़ाई की है और डॉक्टर ऑफ फिलोसोफी की डिग्री भी हासिल की है ,उनकी ये डिग्री इतनी बड़ी है की सुप्रीम कोर्ट के जज को भी दबा सकती है,नेता को ये आजादी है कुछ भी बोल सकते है,चाहे वो किसी पार्टी के हो,कोई नियंत्रण नही है,जिसकी सरकार होती है,वो खुद को इस मुल्क का शहंशाह समझता है,उसको लगता है मेरा कोई कुछ बिगाड नही पाएगा,न्यायपालिका बनाम कार्यपालिका जिसके बीच ऐसा मानो जंग छिड़ गया हो,
वक्फ कानून लागू होने के बाद पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में हुए दंगे को लेकर सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगाने और अर्धसैनिक बल की तैनाती,तीन रिटायर्ड जजों की निगरानी इस मामले पर,और राज्यपाल को भी रिपोर्ट जारी करने का आदेश के लिए याचिका डालि है,इस पर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बी आर गवई का कहना है की आप चाहते है की हम केंद्र सरकार को राष्ट्रपति शासन लागू करने का निर्देश दे,हम पर तो वैसे भी अधिकारों में दखल देने का आरोप लग रहा है,बता दे की विष्णु शंकर जैन वही अधिवक्ता है जिन्होंने उत्तर प्रदेश के संभल में शाही जामा मस्जिद के जगह हरिहर मंदिर होने का दावा किया था,उन्होंने अयोध्या,ज्ञानवापी,जैसे मामलों में अहम भूमिका निभाई है ,जस्टिस गवई और जस्टिस एजी मसीह ने बीजेपी सांसद दुबे का बिना नाम लिए कहा है की हम पर कार्यपालिका के कार्यों में दखल देने का आरोप लग रहा है तो हम कैसे आदेश दे सकते है
बता दे देश में बीजेपी की सरकार है तो इनके नेता कुछ भी बोलेंगे,आपको बता दे की झारखंड के गोड्डा के बीजेपी सांसद निशिकांत डूबे ने सुप्रीम कोर्ट पर टिप्पणी की थी उसके बाद पार्टी इनके बयान से किनारा कर ली ,बीजेपी का कहना है कि ये उनका निजी बयान है इससे पार्टी का कोई लेना देना नही है,बता दे निशिकांत डूबे ने वक्फ कानून के खिलाफ जो याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई थी,उसपर टिप्पणी करते हुए कहा है कि अगर कानून सुप्रीम कोर्ट बनाने लगे तो फिर देश में संसद का क्या काम है,डूबे का कहना है कि देश में धार्मिक युद्ध बढ़काने में सुप्रीम कोर्ट की जिम्मेदारी है,डूबे ने कहा है कि संसद को बंद कर देना चाहिए अगर हर बात के लिय सुप्रीम कोर्ट जाना पड़े,निशिकांत दुबे ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना पर उंगली उठाते हुए कहा की भारत ने जितने भी गृह युद्ध हो रहे है उनका जिम्मेदार संजीव खन्ना है हालांकि बीजेपी के नेताओं ने दुबे के बयान से किनारा करते हुए कहा की बीजेपी से इस बयान का कोई लेना देना नही है ,बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जय प्रकाश नड्डा ने कहा है कि पार्टी का इस बयान से कोई लेना देना नही है,उनका चीफ जस्टिस पर दिए गए बयान से बीजेपी का कोई लेना देना नही है,ना ही ऐसे बयानों का पार्टी समर्थन करती है,जेपी नड्डा ने सर्वोच्च न्यायालय का गुणगान करते हुए कहा की पार्टी न्ययालय का पूरा सम्मान करती हैं और उनके दिए गए फैसलो का पालन करती हैhttp://news24hourslatest.in
वही राज्यसभा सांसद दिनेश शर्मा ने भी सुप्रीम कोर्ट पर तंज कसा और कहा है कि भारत के संविधान के हिसाब से कोई भी राज्य सभा और लोकसभा को निर्देशित नही कर सकता ,जेपी नड्डा ने भी दिनेश शर्मा के बयान से भी किनारा करते हुए कहा है कि ये बयान इनका व्यक्तिगत बयान है इनका पार्टी से कोई संबंध नहीं है ,हालाकि बीजेपी में एक के बाद एक नेता सर्वोच्च न्यायालय पर टिप्पणी करते हुए नजर आ रहे है,पार्टी को इनके खिलाफ एक्शन लेने के बावजूद इनके बयान से किनारा कर ले रही है
मामला यहां तक आ पहुंचा है की क्या सुप्रीम कोर्ट अवमानना के लिए नोटिस भेज सकता है निशिकांत दुबे को आइए जानते है
निशिकांत दुबे की सर्वोच्च न्यायालय पर दिये गए बयान पर क्या सुप्रीम कोर्ट अवमानना के लिए नोटिस भेज सकती है?दरसल हमारे संविधान में अनुच्छेद १०५ है जो सांसदों को बोलने और मतदान करने का अधिकार देता है और ये भी कहता है की सांसदों को भी कुछ अधिकार दिए गए हैं जिसके तहत वो कुछ भी बोले तो उनपर सीधे कार्यवाही नही हो सकती अगर वो बयान संसद के कार्यवाही के दौरान बोला गया है लेकिन अगर कोई कार्यवाही होती भी है तो लोकसभा और राज्यसभा के स्पीकर के अनुमति से ही होगी,चुकी निशिकांत दुबे का बयान संसद के बाहर दिया गया है इसलिए इनको नोटिस भी भेजा जा सकता है
दुबे के बयान के बाद उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का बयान
दरअसल ये मामला तमिलनाडु सरकार बनाम तमिलनाडु राज्यपाल का है ,8 अप्रैल को कोर्ट में सुनवाई के दौरान कहा की राज्यपाल की तरफ से भेजे गए बिल को राष्ट्रपति की तरफ से तीन महीने में फैसला देना होगा ,राज्यपाल के पास राज्यविधानसभा की तरफ से भेजे गए विधेयकों पर राष्ट्रपति के पास,वीटो का अधिकार नहीं है,उनकी बिल की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है ,वे किसी बिल को अनिश्चितकाल के लिए रोक नहीं सकते,अदालत ने कहा है कि विधेयक को पारित करने के लिए एक महीने का समय पर्याप्त है, भारत के उप राष्ट्रपति ने सर्वोच्च न्यायालय पर अपनी नाराजगी जाहिर की है,दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने देश के राष्ट्रपति और राज्यपालों को बिलों की समय सीमा तय होनी चाहिए और उसकी मंजूरी भी होनी चाहिए नही तो उनको बताना पड़ेगा की क्यों अधिक बिलों की क्यों अटकाया जा रहा है ,सुप्रीम कोर्ट के इस बयान पर उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने कहा है की अब देश की अदालतें तय करेंगी की राष्ट्रपति को क्या करना चाहिए क्या नही करना चाहिए और कोर्ट सुपर संसद की तरह काम कर रही है, उपराष्ट्रपति ने कहा है की अनुच्छेद 142 (अगर संसद ने अभी तक कोई नियम नहीं बनाया है तो ये राष्ट्रपति को तय करना होता है कि सुप्रीम कोर्ट का निर्देश या फ़ैसला कैसा लागू होगा) के तहत मिला अधिकार अब न्यूक्लियर मिसाइल बन चुका है जो चौबीस घंटे सातों दिन उपलब्ध है,उनके इस बयान पर पलटवार करते हुए कांग्रेस के नेता राशिद अल्वी का कहना है कि संविधान में सुप्रीम कोर्ट को ये अधिकार है की कोई भी संवैधानिक पदाधिकारी अपनी सीमाएं पार करता है तो उसे रोका जाए
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