जाती आधारित रैली भाषण क्यों हो गए बंद:Allahabad HC

जी हां दोस्तों इलाहाबाद उच्च न्यायालय का जाति पर आधारित फैसला आया है,इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जाति को सरकारी और सार्वजनिक अभिलेख से हटाने का आदेश दिया है,जितने भी सरकारी दस्तावेज हैं उनमें अब जाति का उल्लेख बंद होगा,FIR,गिरफ्तारी,पुलिस के दस्तावेजों में अब जाति का कोई उल्लेख नहीं मिलेगा,इस फैसले को आम जनता बहुत महत्वपूर्ण बता रही है क्योंकि हर जगह लोग जाति के नाम पर अपना काम करवा लेते हैं, विशेष वर्ग हावी रहता है अपने से नीचे वालों पर,आईए जानते हैं इस आदेश के मुख्य बिंदु
1-सार्वजनिक स्थान,साइनबोर्ड,वाहन आदि से जाती संबंधित कोई भी निशान हो वह अब हटाए जाएंगे, मतलब की जाति आधारित प्रतीक अब किसी भी वाहन पर दिखाई नहीं देंगे
2-उत्तर प्रदेश में जाति आधारित रैलियां भी अब नहीं होगी
3-हाई कोर्ट का कहना है कि जातिगत महिमामंडन करना संविधान के खिलाफ है और समाज को बांटने वाला है
4-अपवाद के तौर पर एससी/एसटी एक्ट के मामले में जहां पर कानून विशेष रूप से जाति आधारित होता है वहां जाति का उल्लेख वैधानिक रूप से किया जा सकता है
5-दस्तावेजों में पिता के नाम के अलावा अब माँ का भी नाम दर्ज हो
6-सोशल मीडिया पर जहां जाति आधारित भावनाओं को भड़काया जाता है उस पर नजर रखने और कार्रवाई करने की बात कही गई है
7-NCBS(National Crime Record Bureau) मे बदलाव करके जाति आधारित कॉलम को हटाया जाए
जाति आधारित रैलियों पर रोक:
हम सबको पता होता है कि जब चुनाव आता है तो रैलि की बाढ़ आ जाती है और ऐसी रेलिया होती है जिसमें जाति को बढ़ावा मिलता है जिससे कि आपसी सौहार्द बिगड़ता है,एक-एक जाति के अनेक अनेक संगठन बनने लगते हैं और वह संगठन अपनी जाति के रक्षा के लिए सड़क पर उतरते हैं जिससे कि सार्वजनिक व्यवस्था, राष्ट्रीय एकता सब प्रभावित होती है,किसी एक जाति को नीचा दिखाने के लिए अन्य जाति उस पर प्रभाव डालने की कोशिश करती है जिससे कि समाज में वे मनुष्यता का हनन होता है,जाति आधारित पोस्ट न केवल गलियों में बल्कि वाहनों पर भी खूब लगाए जा रहे हैं,इससे परस्पर भेद बढ़ता जा रहा है और कोई इस भेद को मिटाने के लिए आगे नहीं उठाता है,इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश के बाद सरकार द्वारा जारी 10 सूत्रीय दिशा निर्देश में यह बात विशेष रूप से कही गई है कि अब जाति के नाम या स्टीकर वाले वाहनों पर 1988 के तहत सख्त चालान किया जाएगा
सरकारी दस्तावेजों से जाति का नाम हटाना:
अभी तक ऐसा होता था कि सरकारी जितनी दस्तावेज है उस पर जाति का उल्लेख मिलता था और उसी का दुरुपयोग करके लोग अपना काम कराते थे,अभी तक ये होता था कि अपराधी जाति के आधार पर अपनी पहचान बना लेते थे और मजबूत हो जाते थे और अपनी जाति को फायदा पहुंचाने के लिए हर हद तक गिर जाते थे,और यही धारणा हर जाति के लोगों में आ चुकी थी
संविधान को अगर जिंदा रखना है तो हर नागरिक को अपने समाज की ताकत बनकर आगे बढ़ना चाहिए लेकिन किसी एक जाति पर आधारित ना रहे,हर जाति महत्वपूर्ण है, सबका विकास होना चाहिए सब जातियों के प्रति लगाव होना चाहिए,बहुत निंदनीय है कि चुनाव के समय जाति आधारित रैलिया, जाति आधारित भाषण की बाढ़ लग जाती है,पार्टियां जाति देखकर अपने उम्मीदवार खड़ा करती है और लोग अपनी जाति देखकर उस उम्मीदवार को वोट करते हैं कभी भी लोग योग्यता के बारे में,उसके परिश्रम के बारे में जानने की कोशिश भी नहीं की है,हां सावधानी पूर्वक कुछ मामलों में कोर्ट ने जाति का उल्लेख करने की छूट दी है जैसे अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति इनका इस्तेमाल जाति सूचक शब्दों में होता रहेगा क्योंकि कुछ मामले ऐसे हैं जिसमें जाति की चिंता या उल्लेख करना जरूरी हो जाता है,परंतु जो अभिजत्य वर्ग है वो गैर अभिजत्य वर्ग पर हावी हो जाते हैं,ऐसे में उच्च न्यायालय ने जो यह लगाम लगाया है वह बेहद जरूरी है,अगर समाज को जोड़ना है तो जाति को तोड़ना होगा,तभी हमारे देश की अखंडता,एकाग्रता बनी रहेगी और हमारा संविधान भी बचा रहेगा
एक दोहा याद आता है संत कबीरदास का, जो जाति की बात करते हैं उनके लिए है:
जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान।
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान।।
