क्यों लालु यादव ने कभी पिछड़ों की राजनीति नहीं की

नवंबर में बिहार में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं,ऐसे में सारी राजनीतिक पार्टियों जनता को लुभाने में लगी हुई है,जनता के प्रति लोक लुभावन वादे कर रही हैं,सीटों का बंटवारा हो रहा है,उम्मीदवार घोषित किया जा रहे हैं कभी इंडिया गठबंधन में सीट बंटवारे को लेकर दरार पैदा हो रही है तो कभी एनडीए गठबंधन में सीट बंटवारे को लेकर दरार पैदा हो रही है तो कभी जन सुराज पार्टी में दरार पैदा हो रही है,ऐसे में बिहार की राजनीति क्या कहती है?क्या सारे नेता पिछड़ों की राजनीति करने में सक्षम है या फिर जातिगत राजनीति कर रहे हैं,बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव हमेशा से कहते आए हैं कि वह पिछड़ों की राजनीति करते हैं लेकिन अगर सत्य को टटोला जाए तो लालू प्रसाद यादव ने कभी पिछड़ों की राजनीति की नहीं उन्होंने केवल जाति आधारित राजनीति की है
आईए जानते हैं लालू यादव ने कैसे जातिगत राजनीति की:
जब लोग लालु यादव की बात करते हैं कि वो पिछड़ों के लिए राजनीति कि है तो यह गलत है लालू यादव ने नवसामंतवाद की राजनीति की और जब लालू यादव पिछड़ों की राजनीतिक कर रहे थे तो दलितों को,वंचितों को,क्यों हासी ये पर रख दिए थे,एक समय ऐसा था जब लालू यादव रामसुंदर दास का विरोध कर रहे थे,लालु यादव हमेशा कहते थे कि वह रामविलास पासवान के करीबी हैं,नीतीश कुमार के करीबी है लेकिन अंदर ही अंदर लालू प्रसाद यादव दोनों का विरोध भी करते थे, लालु यादव के तीन दशक के राजनीति का विश्लेषण अगर किया जाए तो यह साफ पता चलता है कि लालू यादव पिछड़ों की लिए राजनीति नहीं बल्कि नवसामंतवाद की राजनीति की है
लालु यादव जब मुख्यमंत्री बने:
1990 में लालू प्रसाद यादव जब बिहार के मुख्यमंत्री बने हैं तब उन्होंने ऊंची जातियों के वर्चस्व को चुनौती दिया और नारा क्या लगाया था “भूरा बाल साफ करो” यानी भू से भूमिहार,रा से राजपूत,बा से ब्राह्मण और ला से लाला,शुरुआती दौर में जनता को यह लगा कि लालू प्रसाद यादव सच में सामाजिक क्रांति की नई चेतना लेकर उभरे हैं परंतु समय के साथ उनकी नीतियों में पिछड़ों का सशक्तिकरण काफी पीछे होता गया और जातिगत राजनीति हावी होती गई,यादव जाति को हर क्षेत्र में वरीयता मिलने लगी चाहे वो सत्ता हो,प्रशासन हो या फिर संसाधन हो,उस दौर में सामंती वर्ग को जन्म देने का पूरा श्रेय लालू प्रसाद यादव को जाता है
लालु की विचारधारा और सामंतवाद:
नवसामंतवाद का मतलब होता है कि समाज का वह पुराना ढांचा जो सत्ता,शासन,प्रशासन पर अपनी पैठ बनाएं यानी कि उस पर कब्जा कर ले,लालू प्रसाद यादव ने शिक्षा के,क्षेत्र में,नौकरी के क्षेत्र में,सत्ता के क्षेत्र में पुलिस के क्षेत्र में,संस्थाओं के क्षेत्र में,यादवों की भर्ती करने लगे इस नवसामंतवाद ढांचे में ब्राह्मण,राजपूत पिछड़े लोगों का कोई स्थान नहीं था केवल यादव और मुस्लिम समुदाय के लोगों का वर्चस्व हावी था और इसी सोच को आज की राजनीति में नवसामंतवाद की परिभाषा दी गई है
लालु यादव का जातीय ध्रुवीकरण:
एक वक्त था जब लालू यादव यह वादा करते थे कि वह पिछड़ों के मसीहा है परंतु वास्तविकता कुछ और थी, उस समय लालु यादव के शासनकाल में निषाद,तेली दुसाध,भूमिहार,नाई,लोहार राजनीतिक रूप से निष्क्रिय दिखने लगी और यादवों को विशेष लाभ मिलने लगा, शिक्षा,स्वास्थ्य,रोजगार के क्षेत्र में सुधार करने के बजाय यादव की भर्ती होने लगे,उन्होंने अपनी राजनीति को जाति और धर्म पर लाकर छोड़ दिया
परिवारवाद का जन्म:
लालु यादव का नवसामंतवाद केवल जाति तक सीमित नहीं है वह धीरे-धीरे परिवारवाद में बदल गई, लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करते हुए लालू प्रसाद यादव ने अपने परिवार को राजनीति में सक्रिय करने लगे जिसका देन था की राबड़ी देवी भी मुख्यमंत्री बनी,लालु यादव के बड़े लड़के तेज प्रताप यादव विधायक बने, और छोटे लड़के तेजस्वी यादव बिहार के उपमुख्यमंत्री भी बने और वर्तमान में नेता प्रतिपक्ष भी हैं यह सारे कदम लालू प्रसाद यादव ने जो उठाए थे जो जनता के राज को परिवार के राज मे बदल दिए,जनता को केवल एक भीड़ समझ गया,अब यही जानता जाती के आधार पर वोट डालने लगी और तभी से पूरा यादव समाज का वोट बैंक लालू प्रसाद यादव हो गए
आर्थिक और सामाजिक पिछड़ापन भी जारी रहा:
लालु यादव के शासनकाल में आर्थिक स्थिति बद से बदत्तर हो गई थी,ये तो बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव की बात है,अब दौर बदल चुका है अब उनके छोटे लड़के तेजस्वी यादव बिहार के नेता प्रतिपक्ष हैं और बिहार और उपमुख्यमंत्री भी रह चुके हैं,तेजस्वी यादव हमेशा कहते हैं कि वह हर दल को साथ लेकर चलते हैं चाहे वह दलित हो,चाहे वह उच्च वर्ग का हो चाहे वह पिछड़ा हो,ऐसे में तेजस्वी यादव क्या पिछड़ों की राजनीति करेंगे,अगर वह मुख्यमंत्री बन गए तो या पापा के नक्शे कदम पर चलेंगे,जानने के लिए पढ़ते रहिए मेरा न्यूज़ चैनल
