कांग्रेस क्या सचमुच दलितों की हितैषी है या सिर्फ दिखावा

अक्सर यह सवाल उठता है कि कांग्रेस और दलित(अनुसूचित जाति) के बीच का जो संबंध है वह हमेशा प्रश्न चिन्ह में रहा है,मतलब कि कांग्रेस पार्टी कहती है कि हम दलितों के मसीहा है लेकिन वास्तविकता कुछ और ही नजर आता है,आजादी के पहले और आजादी के कुछ दशक बाद कांग्रेस ही भारत की सबसे बड़ी पार्टी बनकर राज की है,कांग्रेस के समय में ही संविधान बना जिसके अध्यक्षता डॉ भीमराव अंबेडकर ने किया था परंतु यह भी कहा जाता है कि जवाहरलाल नेहरू और डॉ आंबेडकर दोनों के बीच बहुत सारे मतभेद थे ऐसा कहा जाता है कि अंबेडकर को चुनाव हरवाना नेहरू की देन थीhttp://news24hourslatest.in
संविधान में दलितों के लिए आरक्षण कांग्रेस की देंन थी:
संविधान में दलितों के लिए आरक्षण की व्यवस्था भी कांग्रेस के शासन में ही हुई ताकि वह अन्य वर्गों के साथ कंधा से कंधा मिलाकर चल सके,कांग्रेस ने समय-समय पर ऐसी योजनाएं लेकर आई जो दलितों के उत्थान के लिए थी जैसे
1-अनुसूचित जाति उप योजना:इस योजना के अंतर्गत हर बजट में दलितों के उत्थान के लिए अलग रकम निर्धारित की जाती थी
2-दलित छात्रवृत्ति,दलित छात्रावास,भूमि सुधार योजनाएं दलितों के लिए थी
3-दलितों को राजनीति में आगे लाने के लिए कांग्रेस ने आरक्षित सीटों का प्रावधान रखा मतलब की जो सिट आरक्षित होंगी वहां सिर्फ दलित ही चुनाव लड़ सकता है अन्य कोई नहीं लड़ सकता
वर्तमान में कांग्रेस और दलितों के बीच क्या संबंध है:
नेहरू,जगजीवन राम,गांधी यह जो पहले के नेता थे यह दलित के लिए एक मुखर आवाज बनाकर आगे आते थे लेकिन आज की जो कांग्रेस है वह दलितों को सिर्फ एक वोट बैंक के नजरिए से देखती है,आज कांग्रेस पार्टी में दलितों की संख्या नाम मात्र है ज्यादातर नेतृत्व अभिजात्य वर्ग का है,कांग्रेस में आज संगठन स्तर पर दलितों की भागीदारी बहुत कम है,जिस किसी राज्य में चुनाव होता है प्रियंका गांधी उस राज्य के दलितों के घर जाती हैं उनसे मुलाकात करती हैं,उनकी समस्याएं सुनती हैं
दलित वोट बैंक कांग्रेस से क्यों हटा:
बात है 1980 के दशक की जब कांग्रेस से धीरे-धीरे दलित समाज के लोग पीछे हट रहे थे और एक स्वतंत्र राजनीतिक पार्टी तलाश रहे थे जहां पर उनकी बातों को सुना जाए उनकी समस्याओं का निवारण किया जाए क्योंकि कांग्रेस में बड़े-बड़े चेहरे हावी होने लगे थे जो उच्च वर्ग से आते थे,ऐसे में इस बीच लहर आई बहुजन समाज पार्टी की जिसके मुखिया थे मान्यवर काशीराम उसके बाद बहन मायावती हुई जो यूपी की चार बार मुख्यमंत्री रही है जो कि दलित समाज से आती हैं,पूरे उत्तर प्रदेश में दलित समाज की एक प्रखर मुख्यमंत्री हुई थी मायावती,मायावती ने काशीराम के नाम पर आवास बनवाये,रोड बनवाई,कई योजनाएं चालू की जिससे कि दलितों को काफी सहायता मिली,वैसे भाजपा ने भी दलितों को अपनी तरफ आकर्षित करना धीरे-धीरे शुरू किया,भाजपा ने कभी अंबेडकर जयंती,कभी दलित समाज आंदोलन की शुरुआत की उसके बाद अपने पार्टी में दलित समाज के लोगों को शै दिया जिसका लाभ भाजपा को 2014 मैं मिला यानी कि प्रधानमंत्री मोदी को प्रचंड बहुमत से जीत मिली जिसमें दलित समाज का भी योगदान था
राहुल गांधी का दलित प्रेम:
राहुल गांधी अपने बयानों में हमेशा संविधान की बात करते हैं और हमेशा यह कहते रहते हैं कि मैं दलित की आवाज हूं,सवाल यह उठता है कि क्या वो आवाज सिर्फ चुनाव तक सीमित है उसके बाद वह आवाज बंद क्यों हो जाती है,हरिओम वाल्मीकि के घर राहुल गांधी को पहुंचने में जरा सी भी देर नहीं हुई लेकिन जहां कांग्रेस की सरकार है वहां दलितों का क्या हाल है आईए जानते हैं
1-कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है जहां एक दलित युवक को बहुत बुरी तरीके से पीटा गया, FIR भी हुआ लेकिन राहुल गांधी के मुंह से उस दलित परिवार के लिए कोई सहानुभूति प्रकट नहीं हुई
2-कर्नाटक के गांव में दलितों की झोपड़ियां जला दी गई उसके बाद भी नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी वहां के लोगों से नहीं मिले ना ही उस गांव गए
3-हिमाचल प्रदेश में एक दलित कांस्टेबल के साथ अभद्रता पूर्ण व्यवहार हुआ इसमें SC/ST एक्ट भी लगा लेकिन वहां भी राहुल गांधी ने चुप्पी साध ली थी
4-झारखंड में दलित लड़की के साथ गैंगरेप हुआ,उस पर भी कांग्रेस पार्टी ने,राहुल गांधी ने कुछ नहीं बोला जहां सत्ता कांग्रेस की है वहां दलितों पर जितने अत्याचार हो रहे हैं उस पर राहुल गांधी कुछ नहीं बोलते हैं ना उसके घर जाते हैं लेकिन जहां सत्ता उनकी नहीं है और अगर राहुल गांधी के कानों को सुनाई दिया कि दलित को मारा जा रहा है या पिटा जा रहा है तुरंत उसके परिवार के पास पहुंच जाते हैं यही कारण है आज की दलित समाज धीरे-धीरे कांग्रेस को छोड़ते चला जा रहा है क्योंकि आज की कांग्रेस दलितों के लिए कुछ नहीं कर रही है केवल एक वोट बैंक के नजरिए से दलितों को देख रही है,धन्यवाद