क्या आतंकवाद का मजहब होता है

हर साल कोई ना कोई हादसा भारत में जरूर होता है जो याद दिलाता है हमें हमारी पुरानी यादों को,कितने लोगोे की जिंदगी ऐसे हादसों में बर्बाद हो जाती है,खत्म हो जाती है लोग यह सोच भी नहीं पाते कि उनके साथ ऐसा क्यों हो रहा है,जीवन भर दूसरे की भलाई करने वाले निर्दोष भी ऐसे हादसों का शिकार हो जाते हैं,बात करें देश दुनिया की तो वहां भी बहुत सारे आतंकी हमले हुए हैं जो किसी विशेष धर्म से तालुकात रखते हैं तो लोगों को यह सोचने पर मजबूर हो जाते हैं कि क्या आतंकवाद का कोई धर्म होता है,पहलगाम में जो हमला हुआ वह भी एक विशेष धर्म के लोग किये थे,दिल्ली में जो हमला हुआ वह भी एक विशेष धर्म के लोगोे नें किया थाhttp://news24hourslatest.in
क्या आतंकवाद का मजहब होता है:
अगर एक पल के लिए हम मान ले कि आतंकवाद का कोई मजहब नहीं होता लेकिन फिर भी यह सोचने पर हम मजबूर हो जाते हैं कि पहलगाम में जो आतंकी हमला हुआ वह भी एक मजहब के लोग थे,दिल्ली में जो ब्लास्ट हुआ वह भी एक मजहब के काफी पढ़े लिखे लोग थे,यहां तक की सिडनी में जो हमला हुआ उसमें भी एक विशेष मजहब के लोग ही शामिल थे,अलग-अलग देश में हमले होते हैं,नाम बदल जाते हैं,चेहरे बदल जाते हैं लेकिन मजहब वही रहता है,आखिर क्यों मजाक के नाम पर ऐसा खून खराबा और दहशतकर दी देखने को मिलता है
पढ़े लिखे लोग कैसे फंस जाते हैं जाल में:
हमें पता है की कैसे दिल्ली में लाल किले के पास एक कार में ब्लास्ट हुआ जिसमें 25 लोग लगभग मारे गए, हादसा अभी बहुत बड़ा नहीं था लेकिन बहुत बड़ा करने की साजिश में था,फरीदाबाद के अलफलाह यूनिवर्सिटी के पढ़े-लिखे डॉक्टर इस घटना में शामिल थे,आपको बता दे कि इसमें एक महिला भी थी जो पूरी घटना को अंजाम देती थी और जिसका कनेक्शन जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकी संगठन से था,उस महिला का कहना था की वोे अपनी जिंदगी जी ली है,अब दूसरों के लिए जी रही है लेकिन यह क्या बात हुई दूसरों को मार के किसी की जिंदगी कैसे अच्छी हो सकती है,इस औरत का कनेक्शन पाकिस्तान से था,भारत की हर पल की खबर वह पाकिस्तान भेजा करती थी
नारों में है कितनी ताकत:
अक्सर यह देखा गया है की कुछ मजहब के लोग नारा-ए-तकबीर अल्लाह-हू-अकबर जैसे नारे लगाकर ऐसी घटनाओं को अंजाम देते हैं और कहते हैं कि यह अल्लाह का पैगाम है कि हमें काफिरों की हत्या करनी है,और ऐसे आतंकी संगठन में शामिल हो जाते हैं जहां पूरी तरीके से उनका ब्रेनवाश कर दिया जाता है और लोगों के प्रति इतनी नफरत भर दी जाती है कि वह एक दूसरे को मारनें के लिए भी तैयार हो जाते हैं लेकिन सवाल है कि यह विशेष मजहब के लोग ही क्यों करते हैं, क्या ऐसे निर्दोष लोगों की हत्या करने वाले लोगों की मजहब की बदनामी नहीं होती,यह अपने मजहब के ही दुश्मन हो जाते हैं
कैसे भटक जाते हैं ऐसे लोग:
आखिर ऐसे लोग कैसे भटक जाते हैं अपनी राह से की दूसरों को मारने के लिए इतने आतुर हो जाते हैं,आपने देखा कि कैसे दिल्ली में बम ब्लास्ट हुआ इतने लोग मारे गए पहलगाम में धर्म पूछ कर मारा गया,आखिर यह क्या दर्शाता है यह जो आतंकी है यह एक मजहब के ही क्यों रहते हैं और इनका ब्रेन वॉश क्यों किया जाता है,कहा जाता है कि आतंकवाद की कोई जात नहीं होती देशभक्ति का कोई धर्म नहीं होता लेकिन हमारे निर्दोषों को मारने वाले विशेष धर्म के ही हो जाते हैं कुछ लोगों की वजह से पूरी कौम बदनाम होती है
कुछ मुसलमान इसका विरोध नहीं करते:
अगर यह आतंकवादी एक विशेष मजहब के नहीं होते हैं तो मुसलमान इनका विरोध क्यों नहीं करते,क्यों नहीं वह दुनिया को बता देते की जो आतंकवादी होते हैं उनका मुसलमान से कोई संपर्क नहीं है,इस्लाम से कोई नाता नहीं है उन्हें अपने समाज से बहिष्कृत क्यों नहीं किया जाता है,अभी दिल्ली में बम ब्लास्ट हुआ आपने देखा कैसे कुछ लोग इसका बेबाक समर्थन कर रहे थे,लोगों के मरने पर उनका समर्थन करना कहां तक जायज है और यही नहीं जो हमला होता है उसमें निर्दोष मुसलमान भी मारे जाते हैं फिर भी कुछ लोग इसका विरोध नहीं करते, और अगर मुसलमान यह चाहते हैं कि इन दहशतगर्दो को इस्लाम धर्म से ना तोला जाए तो उनका पुरजोर विरोध करना चाहिए उनको अपने समाज में जगह नहीं देना चाहिए लेकिन ऐसा नहीं है हमेशा घटना होती है कुछ संगठन इसका विरोध करते हैं लेकिन अंततः फिर वही मजहब के लोग किसी घटना को अंजाम देते हैं, और अगर ऐसा होता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब इस्लाम को आतंकवाद से तोला जाएगा,अभी भी वक्त है मुसलमानो संभल जाओ और जो ऐसी घटना करते हैं उनको अपने धर्म से बाहर करो और उनके खिलाफ आवाज उठाओ उनके विरोध में रहो तभी आप सच्चे देशभक्त कहलाओगे धन्यवाद
