Sawan Mahina: क्यों महत्वपूर्ण है श्री राम जी की पूजा

दोस्तों ऐसा कहा जाता है कि सावन में भोलेनाथ की पूजा तो होती ही है परंतु भगवान श्री राम की भी पूजा का एक अलग महत्व है, जहां शिव की पूजा होती है वहां राम प्रसन्न होते हैं वहीं जहां राम की पूजा होती है वहां शिव प्रशन्न होते हैंhttp://news24hourslatest.in
सावन महीना: सावन का पवित्र महीना शुरू हो चुका है लोग कावड़ लेकर भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए निकल पड़े हैं, भक्तगण ऐसा मानते हैं कि इस सावन के महीने में जो भी भगवान शिव को प्रसन्न करता है भगवान शिव की उन पर अहेतुक कृपा होती है, कुछ पंडितों और जानकारों का यह भी कहना है कि सावन के महीने में भगवान राम की पूजा का उतना ही महत्व है जितना शिव की पूजा का महत्व है, भगवान राम की पूजा किए बिना इस सावन में शिव की पूजा अधूरी है, रामेश्वरम जो की ज्योतिर्लिंगो में सर्वोपरि माना जाता है, इसकी स्थापना भगवान राम ने खुद अपने हाथों से की थी और ऐसा कहा जाता है कि जो व्यक्ति उसे लिंग की पूजा करता है उसे पर भोलेनाथ का आशीर्वाद प्राप्त होता है, इसका जिक्र तुलसीदास जी ने अपने रामचरितमानस में भी किया है
रामचरितमानस के अनुसार:
होई अकाम जो छल तज सेएही, भक्ति मोरी ते ही शंकर देहि,
ममकत सेतू जो दरसनू करीही, सो विनु श्रम भव सागर तरीही
इसमें भगवान राम का कहना है कि भगवान शिव के समान मुझे और कोई दूसरा प्रिय नहीं है इसलिए शिव मेरे आराध्य हैं जो शिव के विपरीत चलकर या शिव को भूलकर मुझे अपनाने की कोशिश करेगा उसे मैं नहीं मिलूँगा ,शिव प्रसन्न होंगे तो ही मैं भी प्रसन्न रहूंगा, ऐसा तुलसीदास ने जी ने रामचरितमानस की चौपाइयों में लिखा है
लिंग थाप कर विधिवत पूजा, शिव समान मोही और न दूजा,
शिवद्रोही ममता कहवा, सो नर सपनेहु मोहि ना भावा
अर्थात जो व्यक्ति राम को छोड़कर शिव का उपासक होता है या शिव को छोड़कर राम का उपासक होता है, ऐसे भक्तों पर भगवान राम की कृपा नहीं होती है,
मान्यता है कि सावन के महीने में रामचरितमानस का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि कहा जाता है किसकी रचना स्वयं देवादी देव महादेव ने की है जिसका जिक्र तुलसीदास ने किया है
रचि महेश निज मानस राखा,पाई सुसमय सिवा मनभाषा
ताते रामचरितमानस वर,धरेउ नाम हेरि हरसी हर
अर्थात की महादेव ने रामचरितमानस को राज कर अपने मन में रखा था और अक्सर यह देखा गया की पार्वती जी को इन्होंने इसका व्याख्यान सुनाया और शिव जी ने अपने मन में विचार कर इसका नाम रखा रामचरितमानस
जल चढ़ाते समय कौन सा मंत्र पढ़े:
ऐसा कहा जा रहा है कि जल चढ़ाते समय जो शिव का प्रिय मंत्र है “नमः शिवाय ओम नमः शिवाय और श्री राम जय राम जय जय राम” का उच्चारण अगर भक्ति करता है तो शिव की कृपा उसे पर होती है और शिव अत्यंत प्रसन्न होते हैं
भगवान राम और शिव:
ऐसा रामायण में दिखाया गया है कि जब मर्यादा पुरुषोत्तम त्रिलोक के स्वामी भगवान राम 14 वर्ष वनवास के लिए निकल पड़ते हैं अपने राज पाठ को त्याग कर, और इसी वनवास काल के बीच में ही जब भगवान राम जवाली ऋषि की तपोभूमि पर मिलने आए तो भगवान राम नर्मदा तट पर ठहरे थे, जो पर्वतों से घिरा हुआ था, और अपने परम भक्त भगवान राम से मिलने के लिए शिव ही उत्सुक थे लेकिन वह मिल नहीं पा रहे थे बीच में पहाड़ों से घिरा हुआ था मार्ग, इस समय भगवान शंकर को सुझाव आया कि अगर भगवान राम उनसे मिलने आते हैं तो पहाड़ों के बीच में जो कंकर है वह उनके पैर को चुभेंगे , इसलिए भगवान शिव ने उस कंकड़ों को गोलाकार कर दिया ताकि भगवान राम के पैरों में कंकड़ ना चुभे और इसीलिए यह कहा जाता है कंकड़ कंकड़ में शंकर, जब भगवान राम उसको पार करते हुए रेवा तट पर पहुंचे, और एक माह तक भगवान राम वहां रुके और नर्मदा जल से एकत्र किए हुए उस बालू का जलाभिषेक किये, और उनके इस तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शंकर खुद विराजित हुए और भगवान राम और शंकर का मिलन हुआ
इसीलिए यह कहा गया है कि इस सावन के महीने में भगवान शिव के साथ-साथ भगवान राम की भी पूजा करना अनिवार्य है क्योंकि अगर भगवान राम प्रसन्न होंगे तो शिव भी प्रसन्न होंगे और शिव प्रसन्न होंगे तो भगवान राम भी प्रसन्न होंगे
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